बिलासपुर अरविंद मिश्रा शिव तिवारी

“जब क़ानून रिश्तेदारी में झुके — 26 करोड़ की स्मार्ट रोड बनी ‘पर्सनल ड्राइववे’!”
बिलासपुर की 26 करोड़ की स्मार्ट रोड अब कुछ लोगों के लिए “स्मार्ट” सच में हो गई है — क्योंकि यहाँ सड़क जनता की नहीं, रिश्तेदारों की बन रही है। जी हाँ, मेयर पूजा विधानी के करीबी होटल संचालक सुमित विधानी ने सार्वजनिक सड़क के डिवाइडर को ऐसे तोड़ा जैसे ये उनकी निजी ज़मीन हो, और उस पर होटल आनंदा के लिए “स्पेशल एंट्री” बना डाली।

नगर निगम, जिसे जनता के पैसे से ये सड़क बनानी थी, अब उन्हीं की जेब से निकले टैक्स से “VIP रास्ते” तैयार करवा रहा है। निगम अधिकारी मौन हैं, आयुक्त सफाई दे रहे हैं, और पुलिस एनओसी दे रही है — यानी सिस्टम पूरा “आनंद” में है।
सोचिए, अगर कल को हर नागरिक अपने घर या दुकान के सामने इसी तरह डिवाइडर तोड़ दे तो शहर नहीं, मलबा बन जाएगा। लेकिन जब नियम तोड़ने वाला “संबंधित” हो, तो कानून भी आंख मूंद लेता है।
कहते हैं, स्मार्ट सिटी का सपना था – “सड़कें चमकेंगी, व्यवस्था सुधरेगी।” लेकिन यहां तो व्यवस्था ही रिश्तेदारी में बिक रही है। सवाल ये नहीं कि डिवाइडर टूटा — सवाल ये है कि “किस हिम्मत से टूटा?” और “किसकी अनुमति से?”
जनता अब पूछ रही है — क्या ये नगर निगम है या निजी प्रॉपर्टी डिवेलपमेंट कंपनी? क्या यही है वो स्मार्ट सिटी जहाँ नेता और उनके करीबी नियमों को रबर की तरह खींच-तानकर अपनी सुविधा के हिसाब से ढाल लेते हैं?
अंत में बस एक बात:
अगर ये ‘स्मार्ट सिटी’ है, तो जनता बेवकूफ़ नहीं, बस बेहद ‘सहनशील’ है। क्योंकि वो अब भी देख रही है — कानून साइड में खड़ा है और सत्ता “आनंद” में मग्न है।









