बिलासपुर अरविंद मिश्रा शिव तिवारी

मां सतबहिनिया मंदिर: धार्मिक आस्था और सामाजिक चेतना का प्रतीक
बंधवापारा का धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र — मां सतबहिनिया मंदिर
बिलासपुर। अरपापार बंधवापारा में महुआ के सात पेड़ों की छांव तले स्थित मां सतबहिनिया मंदिर आज न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना जागृति का भी प्रतीक बन चुका है। बरसों से यहां सात महुआ वृक्षों को सात बहनों के रूप में पूजा जाता रहा है। अब प्रतिमाओं के साथ स्थापित यह मंदिर भक्तों के सामूहिक सहयोग, त्याग और श्रद्धा की अनूठी मिसाल है।
0महुआ वृक्षों से मंदिर तक का सफर
1996 में यह मंदिर अपने पूर्ण स्वरूप में आया। इससे पहले सात महुआ पेड़ों के समीप सात शिलाओं के रूप में देवियों की पूजा होती थी। मंदिर के स्थापना काल से जुड़े शंकर लाल पाटनवार गुरुजी बताते हैं चार दशक पहले तब बंधवापारा की बस्ती विरल थी। तब ग्रामीणों के मन में मंदिर स्थापना का विचार आया। 1987 से 1996 तक प्रतिदिन प्रभात फेरी और संकीर्तन के साथ अन्नदान एकत्र कर जनसहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य हुआ। विशेषता यह रही कि भिक्षा से जीवन यापन करने वाले भी एक मुट्ठी अन्न दान में शामिल होते थे।
0मूर्ति स्थापना और धार्मिक वैभव
जयपुर से लाई गई मां दुर्गा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा शारदीय नवरात्रि 1996 में पं. रमाकांत मिश्रा (दिवंगत) के पौरोहित्य में संपन्न हुई। मंदिर के गर्भगृह में सिंहवाहिनी मां दुर्गा और परिक्रमा पथ में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, षष्ठीदेवी, माहेश्वरी और वेदमाता गायत्री की प्रतिमाएं स्थापित हैं। आगे चलकर 2011 में श्रीराधा-कृष्ण, श्रीलक्ष्मीनारायण और श्रीसीताराम की युगल मूर्तियां भी स्थापित की गईं।
0सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र
मां सतबहिनिया मंदिर केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यहां मां सेवा जनकल्याण समिति और आकृति महिला सतबहिनिया समिति के माध्यम से वर्षभर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शिव तिवारी ने बताया कि राष्ट्रीय पर्वों पर ध्वजारोहण, तुलसीदास जयंती, जन्माष्टमी, गीता जयंती, रंगोली और चित्रकला प्रतियोगिताएं, योग शिविर और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए बच्चों और महिलाओं की प्रतिभा निखर रही है।
0भक्तों का अपनापन और योगदान
इस मंदिर के प्रति भक्तों का अपनापन अद्वितीय है। यहां के विकास, यहां की व्यवस्था को बेहतर बनाने में हरसंभव मदद के लिए तत्पर रहते हैं। इससे जुड़ी भावना का प्रतीक है 1997 में निर्मित भरत मंच जिसका निर्माण स्व. भरत लाल कश्यप ने यह कहकर कराया कि सपने में माता ने मुझे इसके लिए आदेशित किया है। समय-समय पर कई श्रद्धालु मंदिर के सजावट, विकास और व्यवस्था को बेहतर बनाने में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।

